इस नव वर्ष के शुभ अवसर पर मैंने सोचा क्यूँ न मै हिंदी में अपने विचार व्यक्त करुँ !? गत वर्ष क़ी विडम्बना यह रही कि चाहकर भी नियमित रूप से लिख पाना सम्भव नहीं हो पाया। फिर आंग्लभाषा में लिखना सरल होंने पर भी आनंदानुभूति का आभाव सा रहता है। अभी कुछ दिनों पहले ही यह देख पाया कि 'ब्लॉगर' हिंदी भाषा को भी सरल रूप से लिखने का अवसर प्रदान करता है। सोचा क्यूँ न इसे परखा जाये !!
२०१३ की शुरुआत कुछ इस भांति रही कि जीवन में एक बदलाव अवशम्भावी था और वह हुआ भी। अनायास ही हुआ कहा जा सकता है ! मेरे विचार से प्रयास उस कोशिश को कह सकते है जिसे पूर्व निर्धारित ढंग से निर्णय ले कर किया गया हो। पर जहाँ परिस्थिति जन्य सम्भावित प्रयास हो। जहाँ हम सिर्फ रीएक्ट [.......] कर रहे हों वहाँ वास्तव में अपना प्रयास किस तरह क्लेम [.......... ] कर सकते हैं ? इसे तो अनायास ही कहा जा सकता है। पर इसका श्रेय अवश्य ही अपने परम कल्याणमित्र और विप्पस्सना गुरु श्री भरत ग्रोवर जी को देना चाहूंगा जिन के पुण्य प्रताप से मेरे मन की कुंठाएं एवं भय २०१२ साल के अंत में दूर हुए। २०१२ के अंत में गोराई धम्मपत्तन के १० दिन के शिविर से मन की भ्रांतियाँ दूर हुई और साहस पुष्ट हुआ जिससे २०१३ के शुरू में हुए घटनाओं को समता में रहकर झेल पाये और 'कुछ न करने ' कि अपनी बलवती इच्छा भी पूर्ण हुई। पैर के घुटनो में लगे चोट के कारण उत्पन्न यह भय, कि अधिक देर ध्यान में नहीं बैठ पाउँगा, पर सायास गुरुकृपा से विजय प्राप्त कर पाया। कल्याणमित्र गुरु का आदेश था कि अपनी समाधि मैं पुष्ट करून और अब जब कि सेवानिवृत्ति हो चुकी है अधिक से अधिक शिविर में भाग लेकर समाधी और समता दोनों ही पुष्ट करून।
साल के शुरुआत में ही पडोसी श्रीमती गर्चा के स्वार्थपरक एवं सीमित मनोवृति के कारण उत्पन्न परिस्थिति से मन विकल हो उठा था। विभिन्न विकल्पों में फसा मन जाने क्या क्या कर बैठता अगर गुरुकृपा न होती। अंत में सदबुद्धि विजयी रही और हमने सबको माफ़ करते हुए आगे चलने की ठानी। सबसे विशेष बात यह रही कि इस क्षमा प्रदान की प्रक्रिया पर किसी भी प्रकार की अहंजनित कुंठाओं का प्रभाव नहीं था। क्योंकि जहाँ सिर्फ आप ही हों और अपने ह्रदय के अंतरतम तलों में स्थित रहकर क्षमा प्रदान कर रहे हों तो ऐसी सम्भावना को आश्रय ही नहीं मिलता। वह एक बड़ा ही सफल प्रयोग रहा जीवन में जिससे ध्यान भजन का मार्ग प्रशस्त हुआ और २०१३ के गर्भ में निहित अन्य परिस्थितियों से जूझने का साहस प्राप्त हुआ।
जीवन की परिवर्तन शील प्रकृति हमें अंतर से निराश्रित होना सिखाती रहती है। हम भी बदल रहें हैं। परिस्थितियां भी बदल रहीं हैं तो कौन किस पर आश्रित हो सकता है? आश्रित होने की अपनी विवशता यथार्थ में बड़ी ही बेतुकी सी लगती है। प्रश्न यह उठता है कि क्या हम वाक़ई आश्रित होने को विवश हैं?? बचपन में हम अपने बड़ों, माता-पिता पर आश्रित थे। किशोर वय में भाई-बांधवों पर। फिर पति-पत्नी का आश्रय पूर्ण जीवन। वृद्धावस्था में बेटों-बेटियों का आश्रय। यह क्रम निर्बाध रूप से चलता रहता है। अगर ऐसा आश्रय मन के अनुरूप हुआ तो सुख अन्यथा दुःख। आश्रय मात्र सम्बन्धो का नहीं होता ! आश्रय विचारों का , मान्यताओ का , संप्रदाय का , और भी न जाने कितने तरह के आश्रय हमारा अहम् पाले रहता है जिसके कारण जीवन में सुख-दुःख का उतार चढाव चलता रहता है
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